Sunday, October 10, 2010

कच्ची मिट्टी की खोह

कच्ची मिट्टी की खोह में
प्रिय संग बसाया एक आगार.

नम वायु के झोंके
दीवस के दीप्त मध्याहन
रात्रि की श्याम चादर
ज्यों कोई अश्रु भरी आँखें
अग्नि भरा ह्रदय
और आस रहित जीवन.

मैं अपनी चुप्पी से कहूँ
बाँधे अपना धीर
तुम सुनो पुकार कि आना एक बार.

Sunday, August 15, 2010

तुम्हारे लिए

अध खुले अधर
नमक के समुद्र में
चुनते हुए बिछोह के मोती.

अकस्मात वर्षा के
आगमन की भांति
तुम घेर लो मुझे. मेरे सम्पूर्ण को.

मैं आती हूँ जगत में तुम्हारे लिए
ओ प्रिये.






Wednesday, June 9, 2010

आस



लुढक गया मन का पात्र
बह गया आसव सारा प्रेम का.

सुवास, जल, चांदनी
और तुम्हारे होने की आस ने पी लिया
मेरा अंतस.  

बूँद की तरह फिर उतरो मन के पात्र में.   


Monday, July 27, 2009

ओट

संग हो सकते थे
तुम.

कोई ओट ही होती
होती कोई अजानी बात.

मैं चूम लेती किसी भी बहाने
मेरे छल, मेरे जीवन प्राण हैं.

Wednesday, July 22, 2009

तुम्हारे साथ

तुम्ही ने कहा था
कि मैंने सोच लिया है रहना तुम्हारे साथ
मैंने शुभ्र आकाश और निर्मल समंदर की सौगंध खाकर कहा
आये हो जिस तरह तुम आंधी और बरसात में
मैं भी दुनिया की हर बाधा को करूँ पार तुम्हारे लिए
तुम्हारे साथ

Friday, July 10, 2009

अंकुरण

वे जो स्वर रुंध गए
उनमे तुम्हारे गीत थे

वे जो सूख गए अक्षर
पी गयी उनको
तुम्हारे तिरस्कार की अग्नि.

प्रिये
नेह बीज पुनः अंकुरित होगा.

Tuesday, June 17, 2008

चाह



संभव है मन को
बिछोह ही चाह थी.

अक्षर नहीं पिरोते
तुम्हारे व्यवहार को अपनी माल में.