Saturday, May 18, 2013

सनोबर का पेड़ होती है देह 
हर रात ठंडे आकाश को छूना चाहती है 
ना पत्ते ना फूल 
बस टहनियों की काया का होता है जंगल
पूरा सा चाँद पीने का नशा 
रिस रहा होता है दूध से लिपे हर मुंह पर 
उठ रही होती है तीखी तेज़ महक गिरे हुए पत्तों की 
कोई चल रहा होता है उनपर 
सनोबर को छूते छूते


मैंने घास की नरमाई नहीं नापी 
वहाँ तिनकों के बीच मैं सीधी सहज बैठी रही 
जैसे किसी औपचारिक भीड़ में लोगों के बीच पीठ नहीं झुकाती ....
घास की नर्म बालियों के बीच खो जाया करता हैं हमेशा लेकिन 
मेरी चेतना की चाबियों का गुच्छा 
जैसे शाम की उन्हीं महफ़िलों में खो जाया करता है 
मेरे काजल के दाग वाला रुमाल ....

Friday, May 17, 2013

मैं अनाम सी 
नहीं बताती कि कौन हूँ 
भाग जाने के पहले दो पल को बैठती हूँ स्थिर गहरी सांस के साथ 
स्टेशन की स्वचालित सीढ़ियाँ रोकती भी हैं कदम
और आंसुओं का धक्का छिपा लेती हूँ नीची आँखों में

मुझे सवालों से हमेशा रहा चुप्पी का संबंध 
हाँ हर सवाल इक मृत्यु है 
मेरी हर चुप्पी चीखती है जवाब में 
मैं जीत जाती हूँ मृत्यु से हर बार 
और हार जाती हूँ अपनों से ,अपने-आप से

मैं अनाम सी
नहीं जानती कि तुम कौन हो
मेरी यात्रा के ऊपर बंधा है तुम्हारे शब्दों का पुल
मैं बन जाती हूँ किसी ट्रेन में मिल जाने वाला सुखी संयोग
और तुम्हारे उतर जाने के बाद ,
मैं रह जाती हूँ बन कर धुएँ से भरा पुराना बन्दरगाह !


                      
 बादल के कुरते पर 
चमकता है हुक चाँद का 
ज़रा सी हवा से महकती है चुन्नी 
सरका के पत्तियों की सुगबुगाहट 
जब उँगलियाँ अंधरीली 
छूने लगती है देह सुबह की 
भर आती हैं पंखुड़ियों पर ओस 
रिसने लगती है रात मेरी !
भर आती हैं पंखुड़ियों पर ओस 
रिसने लगती है रात मेरी !

Monday, May 13, 2013

रूह की गहरी खाई में कहीं गहरे से उठती है 
मेरी देह की पुकार 
तुम तक आने का रस्ता खोजती हूँ....
और लुढ़कने लगता है मेरा जिस्म मुझमें 

मैं शीशे के सामने पहनती हूँ चांदी की पायल 
खुल जाती हैं संयम पिरोयी हुई रस्सियाँ मुझसे 
गीले बालों से बनती हैं गीली धारियाँ गले पर 
मैं चमकती हूँ गेहूं-गेहूं 

इक लालसा का छोटा सा तालाब 
तिरती हैं पुरानी सूखी पत्तियाँ ऊपर ऊपर 
धँसता जाता है नियंत्रण यथार्थ का 
भँवर पड़ते हैं तेरी कल्पना के मुझपर 

क्या चिल्लाना और स्थिर रहना खुद के अंदर के साथ खुद के बाहर भी संभव है ?
गीले कागज पर मैं भी तो कभी कभी दो अलग रंग मिला दिया करती हूँ
तेरे मेरे बीच
मैं क्या क्या बचाती हूँ 
और क्या क्या बनता जा रहा है 
इक चिड़े का एक दाना बचाना 
धूप से झुलसे मेरे पंखों के नीचे 
चुपके से रख जाना 
इक समुंदरी पक्षी का विचलित होना 
दूर देस उड़ना छोड़ कर मुझ संग बैठना 
और फिर....
होकर भी ना होना ....

Sunday, May 12, 2013

सुबह के गर्भपात के बाद 
वो रात भर पोंछती रही ज़मीं 
जैसे सब सोचते हैं 
उसने भी इसे नियति और होनी की दे दी संज्ञा 
और जो ना होना था 
वो होता रहा दिन ब दिन साल दर साल 

जैसे कि बर्फीली नदी के कुछ नुंकीले टुकड़े 
फंस जाते हैं किसी ज्वर से तपते माथे पर 
जैसे माथे पर ही पिघलने लग जाये बिंदी 
और सिहरन ठहर जाये आँखों में

जहां तक नज़र जाती है शब्दों के फसलों में
हर दो कोस पर उगा होता है एक भ्रूण का टुकड़ा
सोचूँ कितनी बिंदियों का रंग होगा नसों में मेरी
उन शब्दों का हर एक तिनका सिर्फ सुर्ख होता है

Friday, May 10, 2013



मैं नीली मछली
भारी भरकम रातो में
कल्पना करती हूँ तुम्हारे होंठ चूमने की और जीवित रहती हूँ

जैसे मेरे भूरी आँखों के पीछे
भरता रहता है समंदर
और इस खारे पानी में तैरती मैं तय करती हूँ फासला अपनी प्रिय नाव तक

जैसे सूरज का खोटा सिक्का
मैं उछाल देती हूँ समंदर से निकाल कर
और उस उजाले में मेरी देह की धारियां चमकती हैं संतरे की फांकों सी

जैसे किसी मछुआरन की साडी देख
मैं छिप जाती हूँ गहरे अंतर तक
और वहां भी बाँस की नुकीली टोकरियाँ ही होती हैं मुझे भर लेने के लिए 

Saturday, May 4, 2013

ये अनुमान इक प्रत्याशा है 
या अनुभवों और उम्र की गिनती 
कि इस अंधेरी गुफा के बीच तक पहुँच गयी हूँ शायद ,
अनंत अपुष्पित इस कन्दरा में 
रंग से निशान बनाती 
विचित्र अनुभवों के पत्थरों का निशान पाती 
नगर के लोगों का स्पर्श भूल चली हूँ 
कि प्राणों का बर्तन जब पूरा भर जाएगा 
तब दर्द की कोई धार ना बहेगी और भरेगी मुझमें 
इस गुफा का अंधेरा 
मेरे पंखों और प्रारब्ध से अब भी कम घना है
नग्न आहत आत्मा की अवस्था में
कितनी बार पाया है मैंने
खुद को अपनी छाया में बैठे चिल्लाते हुए
किसी बसे हुए शहर की उजड़ी हुई मूर्तियाँ जोड़ते हुए

तेरी कच्ची शामों पर शिकन थी याराँ
मेरी सुबहें गड़ी रात रात भर
अखियों से ओस पड़ती रही 
मेरी पंखुड़ियाँ भीगी रात रात भर

Tuesday, April 30, 2013

और जब मैंने नोंच ली है सारी फसल 
ज़मीन खा गयी सारे बरखा वाले बादल 
तभी रेत के कंकड़ बीच 
उग आया है मेरा प्रिय कमल 
दलदल से निकल आई कुछ महीन पंखों वाली तितलियाँ 
और सच मानो 
कुछ कोंपलें फूट आई हैं 
मेरी जली हुई उँगलियों पर 

Monday, April 29, 2013


पड़ोस में
मेरे चौक के सामने
इक चम्पा का पेड़ है
और थोड़ा और आगे ,
पुरानी लकड़ी का बेंच
इस अप्रैल के मौसम में
झर-झर जाते हैं कोमल फूल
और वहीं बंधी देखती हूँ
इक अधेड़ ठिठक कर
घूरता है कोमल पंखुड़ियों का जादू
और जूतों की नोंक से उन्हें कुचल कर
संतुष्ट कर लेता है जिज्ञासा
मैं बेंच से बिना उठे
एकटक देखती हूँ उस फूल की मुड़ी टूटी  पंखुड़ियाँ
मेरी निर्निमेष सी टकटकी के बीच
एक वृद्ध जोड़ा रुक कर
उठा लेता है वो फूल
और मैं पलकें उठा लेती हूँ
बची हुई महक को सुड़क लेती है औरत
आदमी परिहार्य बोझ की संज्ञा देकर
नोंच देता है अधटूटे हिस्से
बढ़ जाता है आगे निर्विकार
कुछ पंखुड़ियाँ चिपक जाती हैं उसके जूतों के तले
और कुछ कुचली हुई वहीं रह जाती है
मैं उठ जाती हूँ हठात
रूह पर पड़े नील के निशान
महकने लगते है
मैं चंपई होकर तर-बतर
घर लौट आती हूँ


मैं चाहती हूँ होना 
कोई घसियारन
उम्र की धूप ढले लाद पाऊँ 
ज़ख़्मों के गट्ठर कंधों पर .....
मैं चाहती हूँ होना 
कोई नट
कुछ पैसों के एवज़ में लाँघ पाऊँ
जलते हुए कोयले तलवों प
र .....

Saturday, April 27, 2013


इक किला मैं रोज़ धकेलती हूँ 
मुझे मुक्त होना है 
रूह की बेड़ियाँ चुभती हैं 
इक किला मैं रोज़ बनाती हूँ 
मुझे कैद होना है 
जिस्म की राहें रुलती हैं 
और इक युद्ध होगा अंतर में 
मेरी मुझसे होगी लड़ाई 
मैं जीत कर होउंगी बिदा 
मैं हार कर लौट आउंगी सहने हमेशा के लिए 

Thursday, April 25, 2013

इक जिस्म की बालियों में थी 
भरी सी इच्छाओं के गेहुएँ दाने ....
गदरीली बेलों से भरी फसल की 
महक उठती दूर दूर तक 

इक ज़मीं की मिट्टी में थी 
भरी सी आँखों की गहरी नमी 
दबे बीजों से भरी छातियों की 
हूक उठती हूर हूर कर

Tuesday, April 23, 2013

मैं बट रही हूँ रस्सियाँ 
बारिशों की बची बूंदों से 
रात ओढ़े घूमती है 
सूखे पत्तों की फुसफुसाहट

रात का था एक बांझ गाँव 
तारों के थे बोये बीज 
हर रोज़ इस पगडंडी से होती 
मैं काटूँगी अंधेरे की फसल

Monday, April 22, 2013

अल्हड़ वर्षों की इच्छायेँ 
हमे मार देनी चाहिए शिष्ट होने से पहले 
और इस से पहले की मन हो जाये 
किसी मृत शव की भांति शांत 
हमे नोंच देनी चाहिए हर चंचल कली की पनप 
कि न सफ़ेद की चाह हो ,
ना काले का हो अंत 
और जैसे गिरा ही रहता है जीवन 
जनम और दर्दों के बीच 
दबी ही रहती है बात 
लफ्जों और संकोचों के बीच
हमें सीख लेना चाहिए मरना
और असंख्य बार मर कर गिनती ,बचे हुए दिनों की
चाँद को देखकर रोती हूँ 
तारे देखकर नाचती हूँ 
बेहिसाब है मेरा प्यार भी 
अपने हर गुप्त अनैतिक और पवित्र अंश से मैं 
एक जंगली लड़की हूँ ....

Sunday, April 21, 2013

अल्हड़ वर्षों की इच्छायेँ 
हमे मार देनी चाहिए शिष्ट होने से पहले 
और इस से पहले की मन हो जाये 
किसी मृत शव की भांति शांत 
हमे नोंच देनी चाहिए हर चंचल कली की पनप 
कि न सफ़ेद की चाह हो ,
ना काले का हो अंत 
और जैसे गिरा ही रहता है जीवन 
जनम और दर्दों के बीच 
दबी ही रहती है बात 
लफ्जों और संकोचों के बीच
हमें सीख लेना चाहिए मरना
और असंख्य बार मर कर गिनती ,बचे हुए दिनों की

Wednesday, April 17, 2013

भोर के पूरे कपड़े पहनने से पहले 
मैं चली आती हूँ समंदर के किनारे 
रात मेरे सामने ही पहनती है सुबह के कपड़े किसी थकी हुई युवती की तरह 
मुझे याद आता है 
कि मैंने बहुत दिनों से शृंगार नहीं किया 
लहरों की खन-खन आवाज़ में दब जाती है सँवरने की सोच 
पैरों के अंगूठे को खींच लेती हूँ खुद तक 
और रेत मेरे कपड़ों पर लगी ही रहती है......अछूती 
समुद्र देख रहा है मुझे सीपियाँ ताकते 
मैं लौटा देना चाहती हूँ उसे 
हर वो सीपी जिसे मैंने प्यार किया है
किसी मछुआरन की तरह मैं काट देना चाहती हूँ
अपनी शब्दों में मचलती गहरी मछलियाँ ....
किसी विचलित पल मैं बिखरने का भाग्य
उसी क्षण पा जाना चाहती हूँ ....
और डरती हूँ
कि मेरी पुकार आखिर सुन ली जाएगी
और डूब जाएगा समंदर मेरा
रात को नींद से पहले 
मैं तय करती हूँ अपने स्वप्न 
उढेल देती हूँ तकिये पर सारी गीली यादें 
और जैसे ही आने को होते हो तुम 
मैं बंद कर देती हूँ सुबह का कमरा 
चाँद की चादर के नीचे ही खुलती है आँखें 
और मेरी नदी के किनारे के पत्थर 
मैं खुद लगती हूँ चुराने
मैं अब 
बचपन के दिनों की तरह 
कल्पना में नहीं हो पाती किसी सुंदर द्वीप पर 
नहीं उगती नमक लगी इमली की गुच्छियाँ नारियल के पेड़ों पर 
पैरों से उलझता सागर अब डाब सा मीठा नहीं होता 
मैं अब 
बचपन के दिनों की तरह 
यथार्थ में भी नहीं हो पाती अपने कोने में बैठी 
पेंसिल बॉक्स में नहीं भरी होती फूलों की पंखुड़ियाँ 
आँखों से उलझती साँझ अब गुलाब शर्बत की ठंडक नहीं देती 
मैं अब
ना कल्पना में हूँ , ना यथार्थ में
ना सपने में ,ना देह में
रात के गर्भ और सुबह की गोद के बीच
रहस्य के बोध और मंत्र के साम्य के बीच
मैं अब

Sunday, April 14, 2013

वो जिन्हें मैं प्यार किया करती हूँ

मैं बनाती हूँ नदी अपनी नसों में ,
जब सूखे पत्ते सा भार लेकर छलकने लगती हैं लहरें 
मैं खोज रही हूँ एक सफ़ेद पाल वाली नौका 
और उसमे हरे डंठल वाले बेला भर कर लाता नाविक 

इक उम्र की सड़क है
और गलियां मुझसे अनजान भटकती हैं
मैं किनारे किनारे चलती हूँ धीरे
जब बीच रास्ते में खो जाता है मुझसे घर बार-बार

जिन्हें मैं प्यार किया करती हूँ
वो नहीं देख पाते मेरी नदी में नीली मछलियाँ
और मेरी सड़क पर पहियों की आवाज़ रहती है अनसुनी उनसे
मेरी भिंची हुई नसों में बनती ही रहती है नदिया
मेरी खुली हुई हथेली पर जलती ही रहती है सड़क
मैं जूझने लगती हूँ मुझमे फूंके हुए नकली प्राणो से
वो जो मुझमें मौन भरते हैं
वो जिन्हें मैं प्यार किया करती हूँ

Wednesday, April 10, 2013

मन की चौखट पर 
तेरे कदमों के निशां अधमिटे 
मैंने तुलसी का बोया बीज
आँगन मे उग आए तेरे इल्जामों के पौधे ....


तेरी चाह को बना कर सलाइयाँ 
बुनती हूँ वक़्त के धागे सजन 
लम्हों की नर्म कमीज़ पहन कर 
तेरी साँसों से महक उठती हूँ .....

Monday, April 8, 2013

और मैं सीखती ही जाती हूँ......

रात भर पाला पड़ता रहा .....
मैं सुनती रही कुछ आवाज़ें खिड़की से तैरती मुझ तक आती हुईं.....
गीली घास पर बर्फ के भार का अंदाज़ा लगाना 
मुझे प्राकृतिक रूप से महसूस होता है 
खुद पर के भार के नीचे दबने का बोध 
और उसकी चीखें कभी सीख नहीं पाती 
कभी कभी बांस के अंदर भी पकती है आंच 
और बोझिल लौ का भार नापती 
अंदाज़ा लगाती हूँ कि कितना महीन है अंतर 
धूप से सिंकने और उसी धूप से जल जाने में ...
...........
और मैं सीखती ही जाती हूँ .......
कि आवेश मे किसी के चूम लेने से
उसे प्रेम नहीं हो जाता
कि प्रेम का अर्थ नहीं है किसी को निहारते रहना
कि बांस में फूलती आंच जला देती है पूरा बांस
कि पाला पड़ने के साथ कभी पड़ते हैं छाले
कि लोग भी कभी बन जाते हैं माचिस की तीलियाँ
कि मैं मिट्टी के तेल सा भूला स्वभाव अब तक रखती हूँ
और मैं सीखती ही जाती हूँ.......

Friday, April 5, 2013

बारिशों के पानी से
मैं बनाती रही अंजुलियाँ 
होठों की नमी जाती रही 
सूखा रहा कंठ मेरा 

ऋतुओं के रेशों से 
मैं सिलती रही लम्हों के कुरते
रातों के बटन लगते रहे 
उघडा रहा जतन मेरा

Monday, March 25, 2013


उच्छ्वास रातों की
मैंने हर सुबह पिरोयी
तेरे साँसों की ही महक से
दबी मेरी हर गंधक गलमाल ....

रेशम अँधेरों का
मैंने हर दिन लपेटा खुद पर
तेरी छुअन की ही सिहरन से
पुलके मेरे अधर रक्तलाल ....

Wednesday, March 20, 2013

किसी दरगाह पर बैठ कर
मेरी मूर्छित दुआओं का हिसाब दे खुदाया !
कि संगमरमर से मढ़े तेरी चौखट पार
क्यूँ कब्र है मेरे ही जमीन की ...

Tuesday, March 19, 2013

मैं शब्दों के मीठे बाज़ार गयी 
तुम्हारी बंसी के लिए लायी स्वर
तुम्हें लगी रही उदासियों की धुन 

मैं फूलों के बाज़ार गयी 
मेरे जूड़े के पाँति का शृंगार 
तेरे पैरों से सरकता वियोग हुआ 

कान्हा ,इक तेरा ही वर्ण सांवला ,तेरी ही कृष्णाई छाया 
मेरी स्याही को रचता , मेरे छालों को ढकता है ....
बीते बरसों का एक टुकड़ा 
मैं चाहती हूँ कि कुतर पाऊँ फिर दाँतों से 
जैसे तुलसी वाले लम्हों की एक आटी 
कच्चे दूध वाले पलों की एक घंटी 
स्टेशन पर जड़े बोर्ड से भारी धातु से मढ़े मिनट ....
ये पुराना समय एक षोड़सी के कपड़ों की तरह अब 
मेरी आँखों के नाप में नहीं समाता ....