सनोबर का पेड़ होती है देह
हर रात ठंडे आकाश को छूना चाहती है
ना पत्ते ना फूल
बस टहनियों की काया का होता है जंगल
पूरा सा चाँद पीने का नशा
रिस रहा होता है दूध से लिपे हर मुंह पर
उठ रही होती है तीखी तेज़ महक गिरे हुए पत्तों की
कोई चल रहा होता है उनपर
सनोबर को छूते छूते

हर रात ठंडे आकाश को छूना चाहती है
ना पत्ते ना फूल
बस टहनियों की काया का होता है जंगल
पूरा सा चाँद पीने का नशा
रिस रहा होता है दूध से लिपे हर मुंह पर
उठ रही होती है तीखी तेज़ महक गिरे हुए पत्तों की
कोई चल रहा होता है उनपर
सनोबर को छूते छूते



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