Sunday, May 27, 2012

रंगरेज़ मेरे ...

रंगरेज़ मेरे ...
क्यूँ ना बनाया तुमने
धूप के रंग का मिश्रण
मेरे नैन-पाखी के पंखों का वर्ण
रंग हल्का सा ...
हल्की हया का....
पीत हल्दी से प्रीत-प्रणय का
सुर्खी सुबह के सूरज वाली
हरी काँच की चूड़ी वाली
क्यों भाया तुमको स्वाद रुदन का
रंग घोला तुमने नित्य प्रपंच का
क्यूँ आंच बनाई छल-अग्नि की
क्यूँ देग चढ़ाई मेरे रूह की
किस पानी से कपट बनाया
किस कूँची से भाग्य ठगाया
बस शाल रंगाई छिद्रों वाली
हर बूटे पर विष फैलाया
रंगरेज़ मेरे ......

Thursday, May 24, 2012

कच्ची शराब

कच्ची शराब की कतरनों में....कुछ ऐसे बातें बहती है.....कि खुमार कदमों को फिर एक वर्जित से प्रिय की ओर धकेलता है ....प्रिय जो बाहों मे भर लेगा...चूम लेगा गर्दन के नूर को....पी लेगा हर पोर पूरा सा
........प्यासे मन के हर ओर अब है....इक कच्ची शराब का सोता ......
जिसे ताउम्र बहना है मोहब्बत की झीलों में ...किनारे का रेत......अपना कण-कण खो रहा है....घुलता जा रहा है हर बूंद में.....किस तपिश से पिघल रही है ये बर्फ की नदी .......वर्षों कोई सूरज ना चमका है ......तो क्यूँ इक गर्म सी कल्पना मात्र से......सिहर रही है बर्फ मेरी...

इतना क्यों याद आ रहे हो ....

इतना क्यों याद आ रहे हो...
साध सारी सो रही है
चाह सभी जगा रहे हो
खुद से हुई पराई है
रूह वही बुला रहे हो

इतना क्यों याद आ रहे हो ...
अश्क सारे छोड़ चले हैं
रोग वही लगा रहे हो
शब्द जिनके रूठ चले हैं
...
गीत वही सुना रहे हो

इतना क्यों याद आ रहे हो....
जो इक दिन खो जाना है
क्यों मन मिला रहे हो
आस जिसकी टूट चुकी है
यकीन वही दिला रहे हो

इतना क्यों याद आ रहे हो ...
जिस्म ज़िंदा अब तक क्यूँ है
कमी वही गिना रहे हो
जीस्त से जिसकी जान जुदा है

जान उसे बना रहे हो

इतना क्यों याद आ रहे हो ....
प्रीत पाप का मानक है
रीत वही भुला रहे हो
मंजिल जिनकी मरी पड़ी है
राहें वही बिछा रहे हो
 
 

Sunday, May 20, 2012

कुछ ऐसे भी दिन टाँक दिये जाते हैं...

कुछ ऐसे भी दिन टाँक दिये जाते हैं...
स्वेछचारी दुनिया
अपनी पीठ का हर बोझ जब...
ये कह कर मुझ पर लाद देती है....
कि मेरे सर पर मानो मुकुट सा सजता है !!

कुछ ऐसे दिन सिसकते हैं....
गरम आग मन की जब...
ठंडे अश्रुओं से भीग कर बड़ी-बड़ी लपटे बन जाये .....
उसमे जग अपना हाथ सेंका करता है
... साथ बैठे कुलीन उपदेशक....
नीतिपरक कहानिया सुनाते हैं...
जिसे ना मानने की सज़ा में
मुझे अकेले इक जंगल के बीच
जंगली मन की जंगली जड़ों से ...
बांध दिया जाएगा तृष्णा-तरु से
जिसे सींचना पड़ेगा युगो युगो तक....
दुआ जब तक दम ना तोड़े.....!!

कुछ ऐसे ही दिनों में ....
मैं रात भर सजती रही
नयी जात के काँटों से
मुकुट सहित....अन्य अलंकारों से
कि औरत के जीस्त से टपकता खून
स्वेच्छाचारी दुनिया का.....
वाइन सा नशीला और मादक पेय है

Saturday, May 19, 2012

अभिलाषित हुई

पाँच हज़ार मील की दूरी पर
जन 'वो' सोच कर मुझको...
गाता है इक गीत गर्म सा
सर्द रूह का जवां आँचल
लहकता है जुनून बन कर
उठती भाप सा
कानों में कहता है....
''बुरी लड़की !!,
मजबूर खुली सी बाहें
और जिस्म मेरा
... तेरी रूह छू कर
तुझे चूम जाएगा ''।
उसका ये स्पर्श...
अचानक इक शाम ...
छाती में घुंप जाता है....
और राग-रुधिर का सोता मेरा
लड़ता है सूरज के रंग से
अजब रात की बात रही
बेवजह सी बातें रहीं
रहीं मुरादें गीली सी
गीली वो पूरी शाम रही
सात मलमल में सहेजी
जंग लगी पुरानी लगन
फिर लगती है होठों से ....
फिर कहती है 'प्यास लगी है '
चरित्रहीन सी चाह रही
गुण खो देने की आह रही
उस शाम लड़कर मुकद्दर से
दो पल छिपा कर लकीरों से
अभिलाषित हुई
बुरी हुई बुरी लड़की !

Wednesday, May 16, 2012

राज़ की एक बात...

तुम्हारी डायरी का इक पन्ना चुरा लूँ..?
और उसमे राज़ की एक बात...
कि दिलों-जान से चाहते हो मुझे...
कि रात भर तुमने पुकारा है मुझे
देख के कुछ बारिश की बूँदें...जो गुंथी थी...सटी हुई सी आपस में
मेरी आँखों में कच्ची कोंपलें देख ..
कुछ कवितायेँ उगी थी पन्ने पर तुम्हारे
कि जब तुम्हे सूरज उस दिल गीला सा लगा था...
तुमने सूखे होठों से लिया था...मेरा नाम सा ..
''मैं कह नहीं पाया'' कह कर...जब तुमने कुछ नहीं कहा था आगे....
और मैं पैर के अंगूठे से..कुरेदती रही ज़मीन...
आँगन आज फिर वैसी ही शाम उतरी है....
खाली हाथ ही आई है फिर .....
सोचती हूँ....अपनी आँखों का कुछ पनीला सा रंग उन्हें दे दूँ...
बहला कर उसे फिर....अपनी रात की गोद में सुला लूँ...
कुछ-कुछ हम दोनों तुम्हारी यादों की बौछार में भीग जाए....
थोड़ी सी ओस तुम ...सुबह फिर अपनी एल्बम में सहेज लेना...


सम-भाव के दो हाइकु को जोड़ने की कोशिश की है...एक नवीन अर्थ ...पृथक चमत्कार के लिए ...जबकि दोनों ही का स्वतंत्र रूप से अपना अलग अर्थ है....

मेरी साँसों को
लत है चलने की
तेरी यादों पे !!

रुक जाएंगी
जो तू याद ना आया
हमारी सांसें !!

Monday, May 14, 2012

मेरे सजन ...मेरी सजन ....

जिस मन की निर्जन द्वीप के ...
रूखे रेत के किसी कण ने...
प्रीत-पग्थलियों का स्पर्श नहीं जाना ...
वहीं तुम्हारे प्रेम की बोरी भर बरखा....
मुझे सोनजुही का उपमान से भिगोती है ....
मेरे कल्पवृक्ष !!
मुझे किसी और मिट्टी में ना रोंप देना
कि....रसभरी सी ...सिर्फ तुम पर ललचूँ
मेरे सजन ...मेरी सजन ....

Wednesday, May 9, 2012

नील पुलिन
छिपा है नीलम...
 नभ से नीला



Tuesday, May 8, 2012

तुम्हारी फुर्सत वाली मुस्कान

अपने नए लाल दुपट्टे के...
एक छोर से
जो बांध ली न मैंने ....
तुम्हारी फुर्सत वाली मुस्कान ...
इतराता सूरज भी....
... मारे जलन के पसरा पड़ा रहेगा कहीं ...
सोचो तो सजन , फिर ना
गेहूं की बालियाँ ...बस तकेंगी मेरा आँचल .....
उनकी ठुमक तुम...
एक छल्ले में पिरोकर ,
मेरे पगथली के चारो ओर.....
मेरी लचक से बांध देना
जुटा कर इक
जंगली जवाँ बेला का फूल
टाँक देना जूड़े में मेरे
ये देख जब चन्दा झुका ले नज़रें .....
होठों की कंपन पर तुम...
साँसो की शाल ओढा देना

Monday, May 7, 2012

कुछ मैं पी लूँगी

इस बरसती दुनिया में.....
भीगते भीगते जहां दिल का हर टांका टूटता रहा...
हर सिलाई उधड़ती रही....
वहीं तुम....
अपनी अंगुलिया उलझा कर फटे मन के छेदों में ....
एक शाल सी बुन रहे हो ...
सोचती हूँ...
तुम्हारी साँसों की गरम चिलम सुलगा लूँ...
छालों की आग का कुछ धुआँ तुम पीना....
कुछ मैं पी लूँगी....

Saturday, May 5, 2012

धूप ओढ़ कर खुशबू तेरी......
तुम्हारी बंसी का छल करती है......
काँच के स्वप्न ....
कभी चुभे नैनों को ....
कभी मन को .....

मेरा हर

मेरा हर सिकंदर शब्द ...जहां हार मान जाये...उस पल का एहसास हो तुम.....
मेरा हर सूखा पत्ता ....जहां बारिशें पी जाए ,...उस नशे का आभास हो तुम

haiku

हूक हिया की

बरबस छलकी

भीगी दुनिया