Tuesday, June 17, 2008
Saturday, April 19, 2008
किस विध इतने
तुममें कुछ नहीं टूटता क्या
जब तुम तोड़ते हो किसी को
मैं एक पाषण की करूँ वंदना अनंत
मैं एक पाषण से करूँ विनती
किसी पुष्प का खिल जाना अनुभूत होता है कभी तुमको
कही तुम किसी कांटे से बचाकर चलते हो
तुम किस विध इतने विकट
कठोर
असम्भव
जब तुम तोड़ते हो किसी को
मैं एक पाषण की करूँ वंदना अनंत
मैं एक पाषण से करूँ विनती
किसी पुष्प का खिल जाना अनुभूत होता है कभी तुमको
कही तुम किसी कांटे से बचाकर चलते हो
तुम किस विध इतने विकट
कठोर
असम्भव
Thursday, February 14, 2008
आसक्ति उतरेगी
एक दिन मेरा हो जाता
जो स्वप्न था
उस एक दिन के इंतज़ार में
बीत गयी जाने कितनी रातें.
तुम क्या जानों कि
कितना कठिन है
तुम्हारी उपेक्षाओं की परछाई तले जीना.
कैसे मैं कोसूं तुमको
कि मेरे स्वप्न भी तुम ही हो
कभी तो मेरी रूह छू जायेगी
कभी तुम समझोगे मेरा प्रेम,
आसक्ति उतरेगी
जो स्वप्न था
उस एक दिन के इंतज़ार में
बीत गयी जाने कितनी रातें.
तुम क्या जानों कि
कितना कठिन है
तुम्हारी उपेक्षाओं की परछाई तले जीना.
कैसे मैं कोसूं तुमको
कि मेरे स्वप्न भी तुम ही हो
कभी तो मेरी रूह छू जायेगी
कभी तुम समझोगे मेरा प्रेम,
आसक्ति उतरेगी
Tuesday, October 2, 2007
अनंत आकाश में
मैं जो कहूँ
कि कोई पुष्प ले रहा है आकार
तुम्हरे पश्चात.
कोई अज्ञात
हर लेना चाहता है मेरी उदासी
किन्तु
रेत कण सी बिखर जाती है प्रतीक्षा
अनंत आकाश में.
कि कोई पुष्प ले रहा है आकार
तुम्हरे पश्चात.
कोई अज्ञात
हर लेना चाहता है मेरी उदासी
किन्तु
रेत कण सी बिखर जाती है प्रतीक्षा
अनंत आकाश में.
Tuesday, September 25, 2007
बस एक बार
और क्या कुछ न किया तुमने
मुझे पिरोया अपने हर अंग में.
अब कोई उलीचता है
तुम्हारी याद के घड़े भर-भर
कुछ भीगता फिर भी नहीं.
एक कामना
पुलकित हो मचल जाती है
पुनः पिरोलो एक बार,
बस एक बार.
मुझे पिरोया अपने हर अंग में.
अब कोई उलीचता है
तुम्हारी याद के घड़े भर-भर
कुछ भीगता फिर भी नहीं.
एक कामना
पुलकित हो मचल जाती है
पुनः पिरोलो एक बार,
बस एक बार.
Wednesday, August 8, 2007
मेरा आश्रय
स्मृति के सघन में
रात चुनती रहती है सम्बन्धों के शेष
मैं उधड़ जाऊं सत्य की तरह
तब तुम्हारे अंक में मिले ठौर.
तुम्हारा आलिंगन
मेरा आश्रय है.
रात चुनती रहती है सम्बन्धों के शेष
मैं उधड़ जाऊं सत्य की तरह
तब तुम्हारे अंक में मिले ठौर.
तुम्हारा आलिंगन
मेरा आश्रय है.
Thursday, July 19, 2007
आवृतियाँ
पिया
उदासी का झरोखा
बनता है
पीर की दग्ध सलाखों से.
दूर से चमकती हैं
रक्ताभ रेखाओं के बीच
दुखों की आवृतियाँ.
इकहरा है सबकुछ
सबकुछ जो है मेरे विपरीत.
मोरपंख
रात्रि में खो देता है आभा
मन नहीं खोता कोई भी रंग.
उदासी का झरोखा
बनता है
पीर की दग्ध सलाखों से.
दूर से चमकती हैं
रक्ताभ रेखाओं के बीच
दुखों की आवृतियाँ.
इकहरा है सबकुछ
सबकुछ जो है मेरे विपरीत.
मोरपंख
रात्रि में खो देता है आभा
मन नहीं खोता कोई भी रंग.
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