Saturday, July 7, 2012

तेरे साथ के...

तेरे साथ के...
कच्चे गर्भ के दिन हो मानो
वही अब बिछोड़ की
प्रसव-वेदना सी पीड़ा है ....
यादों की हांडी में कोख सा अंधेरा हो मानो
और स्वाद स्वेद का बिलोया है
हाथ डालती भी हूँ रोज़ ....
पीड़ा....मक्खन सी लिप जाती है !

6 comments:

M VERMA said...

यादों की हांडी में कोख सा अंधेरा हो मानो '
अद्भुत बिम्ब .. वाह

Vijay Kumar Sappatti said...

कविता में इतने सुन्दर बिम्ब प्रयोग किये गये है कि क्या है... बस बधाई स्वीकार करे और आपका आभार !
कृपया मेरे ब्लोग्स पर आपका स्वागत है . आईये और अपनी बहुमूल्य राय से हमें अनुग्रहित करे.

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बस यूँ ही

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सुंदर बिम्ब से रची अच्छी रचना

शेखचिल्ली का बाप said...

गहरी बातें.

रचना दीक्षित said...

यादों की हांडी और कोख का अँधेरा.

बहुत सुंदर.

Jay Kandpal said...

बहुत सुंदर.... आपके शब्द शब्द अपनी कहानी बयां करते हैं..