आज फिर हमने
चाँद मिटा दिया....
नवेली निशा के...
भौहों पर तारे सजे थे...
लबों की ख़ामोशी ने....
सब सुना दिया....
यादें थी कुछ दबी सी उन पर...
हमारी किस्मत ने ...
उन्हें हमारे चौके से ...
भूखा उठा दिया ...
चाँद मिटा दिया....
नवेली निशा के...
भौहों पर तारे सजे थे...
लबों की ख़ामोशी ने....
सब सुना दिया....
यादें थी कुछ दबी सी उन पर...
हमारी किस्मत ने ...
उन्हें हमारे चौके से ...
भूखा उठा दिया ...



3 comments:
स्वाति जी, आपकी कविताओं में जहाँ बहुकोणीय जटिल द्धंद्ध में उलझे एक क्रूर समय की अचूक पहचान मिलती है, वहीं उस से उत्पन्न दर्द और आत्मीयता की तलाश भी मुखर रूप में प्रकट होती है |
बहुत सुन्दर बिम्बयुक्त रचना
wah kya baat hai..." mujhe bhukha utha diya..."
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