मृदु-कम्पन सी...
रात की पीर रही....
हर अश्रु चल रहा..
अज्ञात सिन्दूर स्वप्न रहा ..
प्राण-प्रातः ही की आस रही..
घूँट भर चाह की चाह रही..
हर सुनहला प्याला किरणों का..
पिलाता रहा उन्माद नींद का...
औ सस्मित देव मेरे..
प्रतिबिंबित रहे...
हर मधुर व्यथा के..
मृदु छालों में बसे...
''तेरे'' इसी पीर का उपहार...
रहा मेरी आँहों का आधार...



3 comments:
बहुत खुबसूरत कोमल अहसास और सुंदर शब्द संयोजन बधाई ........
Behtreen likha hai ji...
कोमल एहसासों की खूबसूरत अभिव्यक्ति ....
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