Thursday, February 23, 2012

मृदु-कम्पन सी...

मृदु-कम्पन सी...

रात की पीर रही....

हर अश्रु चल रहा..

अज्ञात सिन्दूर स्वप्न रहा ..

प्राण-प्रातः ही की आस रही..

घूँट भर चाह की चाह रही..

हर सुनहला प्याला किरणों का..

पिलाता रहा उन्माद नींद का...

औ सस्मित देव मेरे..

प्रतिबिंबित रहे...

हर मधुर व्यथा के..

मृदु छालों में बसे...

''तेरे'' इसी पीर का उपहार...

रहा मेरी आँहों का आधार...

3 comments:

Sunil Kumar said...

बहुत खुबसूरत कोमल अहसास और सुंदर शब्द संयोजन बधाई ........

Shah Nawaz said...

Behtreen likha hai ji...

Pallavi said...

कोमल एहसासों की खूबसूरत अभिव्यक्ति ....