Friday, February 3, 2012

प्रिय ...तुम्हे जो पा जाती ...

पिघलता रहा अंतस मेरा....

यूँ छू गयी आँखें तुम्हारी...

दो कटोरी सूरज जो मैं...
...
घूँट घूँट पीती जाती ...

धुप का वही टुकड़ा...

शब्दों के पार छिपाती...

उन्ही शब्दों के अम्बार तले....

चुपके से हाथ बढाकर...

प्रिय ...तुम्हे जो पा जाती ...

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