Thursday, July 14, 2011

वो पल कि जिनमें सान्निध्य तुम्हारा


छू जाता साँसों की धारा

हर क्षण खोना

हर क्षण पाना

यही द्वन्द दिनों का होना

वो दिन कि जिनमें दीप तुम्हारा

मेरी लगन की लौ से हारा

हर क्षण ललकना

हर क्षण जलना

जल कर तुमको स्वयं में पाना .....



बाँध उन लम्हों की

तुम बाँध कर फिर ले आना ....