
तुम्हारा दिया...
सब कुछ ही तो ..
लिया है मैंने...
मन पर..
परत दर परत ठूंसती रही ..
अश्रु से रही सीती..
हर फटा मन का कोना ..
.इस बोझ को लादे
पीठ झुक गयी है मेरी...
आतंरिक वेदना-स्त्रवण ...
हर नस में फ़ैल गया है....
आरोपों को कुचलते कुचलते
मेरे पैर ...
निष्क्रिय हो चुके हैं....
मैं कुछ देर बैठना चाहती हूँ...
मेरे दाता ...
क्या तुम्हारी झोली में ..
मेरी मुक्ति भी है ?



4 comments:
सुन्दर अहसास लिए अच्छी रचना।
आरोपों को कुचलते कुचलते
मेरे पैर ...
निष्क्रिय हो चुके हैं....
मैं कुछ देर बैठना चाहती हूँ...
excellent
nirantar kriyasil rahna nadi ka prayay hai rukna talab ka pratik hai. isliya apne pair ko niskriye hone mat dijiye aur chalte rahiye.
aasmaan ka ek chhin sa hissa mang ke, aanchal bichaya tha armaanon ka, pal pal ki andhiyaan zameen ujadti gayeen, aasmaan ka judwa khatam ho gaya....
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