Tuesday, May 11, 2010

sirf maa ke liye

जीवन पल्लवित और परिष्कृत करने वाली माँ के लिए.....




वात्सल्य का हर क्षण

चम्पई सी मुस्कुराहट

अनुपमित स्नेह

और निवाए से हाथों ने

सीखों का एक गुच्छा बना कर

मन पर सजाया है ,

सजावट का अनुशासन

बांधे है हर उदगार

हर स्वप्न-सींचन...

माँ की आंखों से आया है .....

प्राण-अनुषंग

हर कोमल रंग

रही उनकी ही कृति

कि हरी ने उन्हें

यशोदांश की धारा की ,

दिशाहीन गति औ

झक रजत चन्द्रिका की ,

दिशाहीन फैलाव दिया है

हर मँझदार में किनारा हुई

अंचल से खींचती

वेदना-वेग पारती

माँ......

तुम बहुत थक गई होगी.....

चिर मुस्कान से दीप्त नैन तुम्हारे

अब भी ,

हमें ही खोज रहे हैं.....

तुम्हारे पोरों की स्मृति

भूरी अलकों को

तैल-तोषती

आज भी....

उर-पोषण का

चिर अधिकार लिए है ...

मेरा हर चिकना पत्ता

तुम्हारी नमी लिए है

छाया-छावनी की चाह लिए

मेरी हर कोंपल ,

तकती है तुमको .....

तुम्हारे हर-सम्भव देने के इसी भाव के आगे

मेरा कर्तव्य सदा हारा है........



This is my entry for Blogadda's Contest