Friday, March 26, 2010

उन उलझी बूंदॊं कॊ ....



थका हुआ कॊकिल का जॊड़ा......

आ छुपा है नैनॊं में
नैनॊं का सिमटा सा साहिल .....
सट के है सॊया पड़ा
उन उलझी बूंदॊं कॊ ....
पलकॊं से निथार रहा है
कि कभी तॊ सुलझेंगी गाँठें
मरणासन्न मन की गही
हर धुँए कॊ दबा यहीं
पार जाएगा हर पॊखर
औ पल-पल यूं छाया पली ......

12 comments:

M VERMA said...

मरणासन्न मन की गही
हर धुँए कॊ दबा यहीं
सुन्दर भाव और सुन्दर शब्दगुंठन

संजय भास्कर said...

उन उलझी बूंदॊं कॊ ....
पलकॊं से निथार रहा है
कि कभी तॊ सुलझेंगी गाँठें
मरणासन्न मन की गही
हर धुँए कॊ दबा यहीं
पार जाएगा हर पॊखर
औ पल-पल यूं छाया पली ......

इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

संजय भास्कर said...

ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

Amitraghat said...

उन उलझी बूंदॊं कॊ ....
पलकॊं से निथार रहा है
अति सुन्दर
प्रणव सक्सेना
amitraghat.blogspot.com

रानीविशाल said...

Bahut Sundar...Badhai!

aarya said...

उलझे मन कि गांठे अब खोल रही है कली कली.
सावन आया देश में, कोयल घूम रही है गली गली.
रत्नेश त्रिपाठी

Suman said...

nice

Udan Tashtari said...

वाह! बहुत सुन्दर..हमारा पुराना कमेंट गुम गया.

वाणी गीत said...

उन उलझी बूंदों को पलकों से निथार रहा
कभी तो सुलझेंगी गांठे ....
बहुत सुन्दर ...!!

Tapashwani Anand said...

sundar par uljhi hui rachna..............

ram said...

उन उलझी बूंदॊं कॊ ....
पलकॊं से निथार रहा है
Bahut bahut khub

Ulajh Kar reh gaya tha, Os ki boond Me Suraj Ki Jab Padhi,
Heera To Unhe Bana Diya , Magar hawa Uda Kar le gayi Aandhi Ki Tarah|

विजयप्रकाश said...

बहुतबढ़िया... उन उलझी बूंदॊं कॊ ....
पलकॊं से निथार रहा है