Friday, November 6, 2009

पावस प्रात बिखरी पड़ी है ......



पावस प्रातः बिखरी पड़ी है.....


ले सीली सी ताप

औ हलकी सी भाप

पावस प्रातः बिखरी पड़ी है .....

बादल से न बोलूं आज

फिर छितराऊ रश्मि का राज

नग -शिखर पर टिका कर कोहनी

भोर-नवोढा विचर रही है

झील -झील की बूँद-बूँद में

पावस प्रातः निखरी पड़ी है .....

नील गगन का कोना कोना

पाखी संग बतरस में खोना

नग -शिखर पर सुला कर रोहणी

अरुण-सुषमा छितर रही है

क्षण-क्षण की मोह-माया में

पावस प्रातः पिघली पड़ी है......