पावस प्रातः बिखरी पड़ी है.....
ले सीली सी ताप
औ हलकी सी भाप
पावस प्रातः बिखरी पड़ी है .....
बादल से न बोलूं आज
बादल से न बोलूं आज
फिर छितराऊ रश्मि का राज
नग -शिखर पर टिका कर कोहनी
भोर-नवोढा विचर रही है
झील -झील की बूँद-बूँद में
पावस प्रातः निखरी पड़ी है .....
नील गगन का कोना कोना
नील गगन का कोना कोना
पाखी संग बतरस में खोना
नग -शिखर पर सुला कर रोहणी
अरुण-सुषमा छितर रही है
क्षण-क्षण की मोह-माया में
पावस प्रातः पिघली पड़ी है......


