Friday, November 6, 2009

पावस प्रात बिखरी पड़ी है ......



पावस प्रातः बिखरी पड़ी है.....


ले सीली सी ताप

औ हलकी सी भाप

पावस प्रातः बिखरी पड़ी है .....

बादल से न बोलूं आज

फिर छितराऊ रश्मि का राज

नग -शिखर पर टिका कर कोहनी

भोर-नवोढा विचर रही है

झील -झील की बूँद-बूँद में

पावस प्रातः निखरी पड़ी है .....

नील गगन का कोना कोना

पाखी संग बतरस में खोना

नग -शिखर पर सुला कर रोहणी

अरुण-सुषमा छितर रही है

क्षण-क्षण की मोह-माया में

पावस प्रातः पिघली पड़ी है......

5 comments:

आमीन said...

achha likha hai,,, mera sujhav hai ki thoda aur easy karen... thanks

Aarjav said...

भाषा की प्रांजलता मन मोह गयी ! रम्य वर्णन !

मीत said...

दी जल्दी जल्दी लिखा करो न...
इतने दिनों बाद लिखा है...
ये वही रचना है न जो आपने नवगीत की पाठशाला के लिए लिखी थी...
बहुत सुंदर है....प्रातः का यह रूप...
मीत

अक्षय-मन said...

aapke shabdon mai ek alag hi mahek aati hai ek alag si hi feeling hoti hai jis tarhaan se aap nature par likhte ho wo kamaal hai........


माफ़ी चाहूंगा स्वास्थ्य ठीक ना रहने के कारण काफी समय से आपसे अलग रहा

अक्षय-मन "मन दर्पण" से

हेमंत रिछारिया said...

स्वाति जी बहुत ही सुंदर कविता है। विदेश में रहकर हिन्दी के प्रति ऐसा लगाव देखकर मन अभिभूत हो गया। क्रपया मेरा ब्लाग भी देखें। आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार व स्वागत रहेगा।
www.sarlchetna.blogspot.com
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