Friday, August 21, 2009

सिन्दूरी सिंगार..


सुबह की बाहों में

लिपटी हुई मैं

हर करवट पर मुस्काती

बिखरे बालों में

तुम्हारे ही पोर पाती

सारा आकाश जड़ जाता

तुम्हारे ही शब्दों से

उन्ही शब्दों के पार

हाथों में हाथ लिए

भोर को नींद से जगाती

ओस छिड़क कर पत्तों पर

पेड़ों से नीरा छलकाती

औ दूर उस छोटे मन्दिर में

जब बजती पूजन-झांझ प्रिय

तुम ले चलना उस सोते तक

जहाँ रंग , रश्मि का उत्थान चखे

बस उन बरसते रंगों में

चुन कर लाल रंग की धारा

संवार देना मांग मेरी ..........





10 comments:

समयचक्र : महेन्द्र मिश्र said...

बहुत ख़ूबसूरत रचना

Nirmla Kapila said...

बहुत सुन्दर रचना है शुभकामनायें

raj said...

khoobsurat shabdo se rachi behad khoobsurat kavita.....

नीरज गोस्वामी said...

सुन्दर शब्द...सुन्दर भाव....अति सुन्दर रचना...बधाई..
नीरज

M VERMA said...

सम्वेदनशील, एहसास की खूबसूरत रचना.

कविता said...

Bahut hi sundar bhaav.
Think Scientific Act Scientific

Parul said...

बहुत सुन्दर ....औ दूर उस छोटे मन्दिर में
जब बजती पूजन-झांझ प्रिय
तुम ले चलना उस सोते तक
जहाँ रंग , रश्मि का उत्थान चखे

मीत said...

दी जानती हैं? आपकी रचना पढ़ते हुए मन वहीँ पहुँच जाता है जहाँ आप उसे लेजाना चाहती हैं अपने शब्दों के माध्यम से...
आँखों के आगे एक चित्र सा तैरने लगता है...
और अगर ऐसा मेरे साथ होता है तो सभी के साथ ही होता होगा... तो फिर आपको समझ लेना चाहिए की आपका लिखना बिलकुल सार्थक है...
मीत

Suman said...

nice

ujjwal subhash said...

Wah!!! Behad Sunder ...........