
लिपटी हुई मैं
हर करवट पर मुस्काती
बिखरे बालों में
तुम्हारे ही पोर पाती
सारा आकाश जड़ जाता
तुम्हारे ही शब्दों से
उन्ही शब्दों के पार
हाथों में हाथ लिए
भोर को नींद से जगाती
ओस छिड़क कर पत्तों पर
पेड़ों से नीरा छलकाती
औ दूर उस छोटे मन्दिर में
जब बजती पूजन-झांझ प्रिय
तुम ले चलना उस सोते तक
जहाँ रंग , रश्मि का उत्थान चखे
बस उन बरसते रंगों में
चुन कर लाल रंग की धारा
संवार देना मांग मेरी ..........



10 comments:
बहुत ख़ूबसूरत रचना
बहुत सुन्दर रचना है शुभकामनायें
khoobsurat shabdo se rachi behad khoobsurat kavita.....
सुन्दर शब्द...सुन्दर भाव....अति सुन्दर रचना...बधाई..
नीरज
सम्वेदनशील, एहसास की खूबसूरत रचना.
Bahut hi sundar bhaav.
Think Scientific Act Scientific
बहुत सुन्दर ....औ दूर उस छोटे मन्दिर में
जब बजती पूजन-झांझ प्रिय
तुम ले चलना उस सोते तक
जहाँ रंग , रश्मि का उत्थान चखे
दी जानती हैं? आपकी रचना पढ़ते हुए मन वहीँ पहुँच जाता है जहाँ आप उसे लेजाना चाहती हैं अपने शब्दों के माध्यम से...
आँखों के आगे एक चित्र सा तैरने लगता है...
और अगर ऐसा मेरे साथ होता है तो सभी के साथ ही होता होगा... तो फिर आपको समझ लेना चाहिए की आपका लिखना बिलकुल सार्थक है...
मीत
nice
Wah!!! Behad Sunder ...........
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