
" अपटु विधाता जो धुनता रहा ...
बादल थे या रुई के फाहे ,
पारदर्शी फर्श पर गगन के
धुन-धुन कर बिखराता रहा....
हर तार की तन-तन झंकार पर
बूँदें रही जनमती
श्वेत फाहों के बीच ,मौसम और कलसा गया........"
इसे गद्य कहूँ या पद्य ...............स्विट्जरलैंड के द्वितीय सफर की हरीतिमा , आंखों में छिपाकर ,मैं जिनेवा तक पहुंचाने वाले हवाई-यान में बैठी ,बादलों के ऊपर , अपने आस-पास बिखरे ,श्वेत रुई के फाहों से ,बादलों से घिरे ,इश्वर को अपने काम में लीन निहार रही हूँ...... पड़ोस में रहने वाले सूर्य-देव भी अपनी किरणों द्बारा रुई के फाहों का निरीक्षण कर गए हैं और थोड़ा सा स्वर्णिम रंग भी छिड़क गए हैं ....थोड़ा कम लगा था उनको शायद लेकिन उन्होंने मुंह मोडा नहीं कि सारा स्वर्ण हटा कर बादल अपना श्याम-वर्ण उघाड़ बैठे हैं....उन्हीं की हया टपक-टपक कर ,मेरे वातायन के शीशे पर सरकती ,मुझे छूना चाहती है .....ईश्वरीय लोक की इसी क्रीडा को पलकों पर बसाये ,मैं धरा की ओर बढती हूँ अनतराशे नीलम के रत्नों से पटा ,lake geneva का ताल ,मुझे आकर्षित करने के लिए ,नावों के जरिये ,पानी पर तरह-तरह के निशान उकेर रहा है कुछ की मिनटों में सारी सुषमा ,सारा अलौकिक सौंदर्य ,मेरे पोरों से और खेल रहा था.......



6 comments:
swati जी...तो swijerlaind की ghumaayee हो रही थी......अब शुरू हो jaaiye ..bhaag एक दो teen..हम taiyaar हैं padhne के लिए
very nice post.
बहुत बढिया. चित्र तो बहुत खूबसूरत है ही.
स्वातीजी
सुन्दर swijerlain एवम फोटुओ के लिऐ आपको खुब खुब बघाई।
आभार/ मगल भावनाऐ
हे! प्रभु यह तेरापन्थ
मुम्बई-टाईगर
SELECTION & COLLECTION
सुंदर शब्दों में वर्णन। ये तो थी अनुभूति, कभी किसी पोस्ट में यात्रा के अनुभव भी बताऍं।
वाह आपने तो धरती पर स्वर्ग की सैर kara दी....
मीत
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