Sunday, May 17, 2009

उसी ढलान पर चढी थी मैं ............



उसी ढलान पर चढी थी मैं ......
प्रिय तुम्हे पाने की खातिर
तनती रही , समतल सनी
शीशे की सी बिछी रही
और तुम थे उस ऊंचाई पर
चांदनी की चाह ओढे
झक रजत चन्द्रिका की
शुभ्र प्रभा की रश्मियों से घिरे
था यही विधि का नियम
पहुँचना था मुझे , पहुँची मैं
बस चलती रही अविरल
हर कदम हर पत्थर पारती
और रहे तुम अजेय
उसी ढलान पर चढी थी मैं...................

19 comments:

Shashi Kant Singh said...
This comment has been removed by the author.
Navnit Nirav said...

Bahut umda rachana hai.Mujhe bahut pasand aayi.
Navnit Nirav

Syed Akbar said...

अच्छी रचना... धन्यवाद

BAL SAJAG said...

भावनाओं की गहरी अभिव्यक्ति है...
जो सागर की अंतःकरण में पड़े नायब मोती सरीखे है ...जो ब्लॉग पर बिखर रहे है... यूं ही लिखते रहिये ..
कभी वक्त मिले तो इस बच्चो के ब्लॉग पर भी शिरकत करियेगा...
http://balsajag.blogspot.com

Udan Tashtari said...

बहुत खूबसूरत अंदाज!! बधाई.

M VERMA said...

शीशे की सी बिछी रही ...

अभिव्यक्ति के लिये चुने गये शब्द दिल की गहराईयो तक उतरते है.

सुन्दर रचना के लिए बधाई

मीत said...

आहा....!!
फिर वही...
संदली, सलोनी संवेदनाएं...
बहुत सुंदर.. और दिल को चुने वाली...
आपकी रचनाएँ कभी कभी ऐसे लगती हैं जैसे उमस भरी शाम में कहीं से एक शीतल हवा का मंद सा झोंका आकर रहत दे जाता है...
मीत

ravishndtv said...

बहुत उम्दा।

नीरज गोस्वामी said...

सुन्दर अभिव्यक्ति....शशक्त लेखन...बधाई...
नीरज

अभिषेक ओझा said...

आपके जैसी हिंदी और भावनाएं दोनों ही ब्लॉग जगत में अन्यत्र उपलब्ध नहीं है !

रंजना said...

पढ़कर मुंह से अपने आप "आह" और "वाह" दोनों निकल गया....

komal bhavon को इतने hridaysparshee dhang से abhivyakti dee है की मन bandh गया इन panktiyon में.....वाह !!!

ऐसे ही likhtee rahen...shubhkaamnaye...

अनिल कान्त : said...

waah ...waah kahne ko man kar raha hai
ultimate, superb!!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

सशक्त भाव दर्शाती सार्थक कविता के लिये बधाई आपको
स स्नेह,
- लावण्या

Science Bloggers Association said...

ise kahte hain prem ka uddatt vardan.
-Zakir Ali ‘Rajnish’{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

श्रद्धा जैन said...

bahut achhi abhivayakti
aur sunder bhaav

Jayant Chaudhary said...

स्वाति जी...

क्या बात है...
कुछ ख़ास है..
यह अंदाज है..
जैसे गाज है..

लिखते रहिये..
परोसते रहिये..
हम भूखों को,
और क्या चाहिए!!!

~जयंत

Vijay Kumar Sappatti said...

swati ji
hindi me itni achi kavita bahut din o baad padhne ko mili ....
prem ke naye dimentions ko darshati hui kavita hai ye ..

aapko meri dil se badhai ..

meri nayi kavita padhkar apna pyar aur aashirwad deve...to khushi hongi....

vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com

dr. ashok priyaranjan said...

अच्छा लिखा है आपने । प्रभावशाली और मंथन के लिए प्रेरित करने वाले विचारों को शैल्पिक कुशलता के साथ सीधी सरल भाषा में प्रस्तुत किया है जो सहज ही प्रभावित करते हैं ।

मैने अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा है-फेल हो जाने पर खत्म नहीं हो जाती जिंदगी-समय हो तो पढें और कमेंट भी दें-

http://www.ashokvichar.blogspot.com

अक्षय-मन said...

WAAH WAAH WAAH!.....
KHUB GEHRE BHAV BHARE HAIN AAPNE APNI RAHNA MAIN IN SUNDAR SHABDON SE,./.........
BAHUT HI ACCHA LIKHA HAI

अक्षय-मन