प्रज्ज्वलित है पलाश आज .....फ़िर से उठी है उमस
अलसाई सी घास
निर्निमेष निहारती
अरुण पुष्पों के कटाव
पलाश का हर उतार-चढाव
कच्चे कोपलों की अग्नि में
ज्यों निष्ठुर का तप्त छल
और हर अन्तर का पराग ज्यों
प्रिय का चिर अनुराग
प्रज्ज्वलित है पलाश आज.............
11 comments:
वाह... वाह... वाह...
आज सचमुच यह पलाश प्रज्ज्वलित है...
आपके द्वारा लिखी गई हिंदी की कविता पढ़ कर यूँ लगता है ज्यों चाशनी में दुबे शब्द पढ़ रहा हूँ...
बहुत सुखद सी अनुभूति होती है...
अब ये सिलसिला टूटने न पाए...
ढेर शुभकामनायें के साथ...
मीत
पलाश से आपने जो चित्र खींचा है...
सुन्दर बहुत सुन्दर..
~जयंत
वाह!! बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..आजकल इतना कम क्यूँ?
बहुत सुन्दर कविता लिखी है।
घुघूती बासूती
पलाश पर बहुत अच्छी कविता है . लिखती रहिये .
सचमुच बढिया रचना है .. बधाई।
mujhe aapki rachna bahut achchhi lagi
aajkal aap kam likh rahi hain
मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति
Bahut khood.
shbdon ka sanyoja bahut hi sarahniya hai.
Navnit Nirav
उत्तम अभिव्यक्ति आपने पलाश का शब्द चित्र उकेर दिया साधू.
प्रज्ज्वलित is not written rightly. it should have only half ja.
swatiji apne sundar chitrakari ka parog kiya hai
apko abhinandan .....
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