Tuesday, May 5, 2009

प्रज्ज्वलित है पलाश आज

प्रज्ज्वलित है पलाश आज .....
फ़िर से उठी है उमस
अलसाई सी घास
निर्निमेष निहारती
अरुण पुष्पों के कटाव
पलाश का हर उतार-चढाव
कच्चे कोपलों की अग्नि में
ज्यों निष्ठुर का तप्त छल
और हर अन्तर का पराग ज्यों
प्रिय का चिर अनुराग
प्रज्ज्वलित है पलाश आज.............

11 comments:

मीत said...

वाह... वाह... वाह...
आज सचमुच यह पलाश प्रज्ज्वलित है...
आपके द्वारा लिखी गई हिंदी की कविता पढ़ कर यूँ लगता है ज्यों चाशनी में दुबे शब्द पढ़ रहा हूँ...
बहुत सुखद सी अनुभूति होती है...
अब ये सिलसिला टूटने न पाए...
ढेर शुभकामनायें के साथ...
मीत

Jayant Chaudhary said...

पलाश से आपने जो चित्र खींचा है...
सुन्दर बहुत सुन्दर..

~जयंत

Udan Tashtari said...

वाह!! बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..आजकल इतना कम क्यूँ?

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर कविता लिखी है।
घुघूती बासूती

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

पलाश पर बहुत अच्छी कविता है . लिखती रहिये .

संगीता पुरी said...

सचमुच बढिया रचना है .. बधाई।

अनिल कान्त : said...

mujhe aapki rachna bahut achchhi lagi
aajkal aap kam likh rahi hain

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

Navnit Nirav said...

Bahut khood.
shbdon ka sanyoja bahut hi sarahniya hai.
Navnit Nirav

Sudhir (सुधीर) said...

उत्तम अभिव्यक्ति आपने पलाश का शब्द चित्र उकेर दिया साधू.

pramod said...

प्रज्ज्वलित is not written rightly. it should have only half ja.

kaviraj said...

swatiji apne sundar chitrakari ka parog kiya hai
apko abhinandan .....