कित खोयी मोरी राधा प्यारी
पुते हाथ, ले पिचकारी संग
गुलाल काचौ,काचौ राग-रंग
पछि-पछि देखे फूल पात सब
कित छाई छोरी , दरस को रस
पीत फूल बिच पीरी तितरी
उस पर श्याम की पीली चुनरी
ज्यों चंद्रदेव होड़ लगावे
निज आभा संग चांदी छावे
औ राधा छिपी कन्दब की छैया
भोर, जमुना और छितरी थी गैया
पर छिपा न पायी साडी का पाड़
देख दमक कृष्ण गए ताड़
औ छेड़ी ऐसी बंसी की तान
खिंच आई दुलारी ,बिसरा सब ध्यान
बस कृष्ण पकड़े राधा की चोटी
मोड़ी बैयाँ औ बरसाने की छोटी
केसर सगल पुष्प भिजायो
केसर सगल पुष्प भिजायो
गोर हाथ से तिलक लगायो
होरी ऐसी रंगी अब बन में
बृंदा भी रंगी कृष्ण-रंग में
दोउ बासे जित भक्त हृदै
सोई ना देखे बिरह कदै




14 comments:
होली का रंग चढ़ने लगा..बढ़िया रचना. :)
आपने रंग और गुलाल के साथ वरसाने की होली की याद दिला दी। पहली बार लगा कि फाल्गुन आ गया।
सुंदर फाग रंग बिखरा आपकी इस रचना में
bahut bahut khubsurat
Holi hai....
ये आपने तो अभी रंग उड़ेल दिया ब्लौग जगत में
...वाह !
वाह स्वाति जी बडी अच्छी कविता लिखी हैं आपने ,वैसे राधा कृष्ण को खोज रही हैं ऐसी कविताये तो बहुत हैं लेकिन कृष्ण राधा को खोज रहे हैं ये बात बड़ी भली लगी ,सुंदर कविता के लिए बधाई
कृष्ण का राधा को खोजना होली के चलते ही हो सका क्या
सुंदर कविता
दिल खुश कर दिया आपने...
बहुत सुंदर लिखा है...
मीत
प्यार के रंग से सनी ये कविता मन को भा गयी भई.......!!
लगातार लिखते रहने के लिए शुभकामनाएं
सुन्दर रचना के लिए बधाई
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहिए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
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swati jee,
shubh sneh, bahut dino baad aayaa idhar, magar dekhaa to raadhaa abhee bhee krishn kee diwaanee hai aur ham dono ke hee. likhtee rahein.
pihstpeshan! aakhir kab tak?
m
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