Monday, February 16, 2009

कृष्नायी राधा ज्यूँ

बन बन खोजे कृष्ण बियारी
कित खोयी मोरी राधा प्यारी
पुते हाथ, ले पिचकारी संग
गुलाल काचौ,काचौ राग-रंग
पछि-पछि देखे फूल पात सब
कित छाई छोरी , दरस को रस
पीत फूल बिच पीरी तितरी
उस पर श्याम की पीली चुनरी
ज्यों चंद्रदेव होड़ लगावे
निज आभा संग चांदी छावे
औ राधा छिपी कन्दब की छैया
भोर, जमुना और छितरी थी गैया
पर छिपा न पायी साडी का पाड़
देख दमक कृष्ण गए ताड़
औ छेड़ी ऐसी बंसी की तान
खिंच आई दुलारी ,बिसरा सब ध्यान
बस कृष्ण पकड़े राधा की चोटी
मोड़ी बैयाँ औ बरसाने की छोटी
केसर सगल पुष्प भिजायो
गोर हाथ से तिलक लगायो
होरी ऐसी रंगी अब बन में
बृंदा भी रंगी कृष्ण-रंग में
दोउ बासे जित भक्त हृदै
सोई ना देखे बिरह कदै

14 comments:

Udan Tashtari said...

होली का रंग चढ़ने लगा..बढ़िया रचना. :)

Hari Joshi said...

आपने रंग और गुलाल के साथ वरसाने की होली की याद दिला दी। पहली बार लगा कि फाल्‍गुन आ गया।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सुंदर फाग रंग बिखरा आपकी इस रचना में

mehek said...

bahut bahut khubsurat

AKSHAT VICHAR said...

Holi hai....

गौतम राजरिशी said...

ये आपने तो अभी रंग उड़ेल दिया ब्लौग जगत में
...वाह !

राधिका बुधकर said...

वाह स्वाति जी बडी अच्छी कविता लिखी हैं आपने ,वैसे राधा कृष्ण को खोज रही हैं ऐसी कविताये तो बहुत हैं लेकिन कृष्ण राधा को खोज रहे हैं ये बात बड़ी भली लगी ,सुंदर कविता के लिए बधाई

रौशन said...

कृष्ण का राधा को खोजना होली के चलते ही हो सका क्या
सुंदर कविता

मीत said...

दिल खुश कर दिया आपने...
बहुत सुंदर लिखा है...
मीत

bhootnath( भूतनाथ) said...

प्यार के रंग से सनी ये कविता मन को भा गयी भई.......!!

रचना गौड़ ’भारती’ said...

लगातार लिखते रहने के लि‌ए शुभकामना‌एं
सुन्दर रचना के लि‌ए बधा‌ई
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है।
लिखते रहि‌ए लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल और शेर के लि‌ए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।
http://www.rachanabharti.blogspot.com
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ajay kumar jha said...

swati jee,
shubh sneh, bahut dino baad aayaa idhar, magar dekhaa to raadhaa abhee bhee krishn kee diwaanee hai aur ham dono ke hee. likhtee rahein.

रवीन्द्र दास said...

pihstpeshan! aakhir kab tak?

swati said...

m