Tuesday, December 30, 2008

जिस कोने में खड़ी हूँ मैं ........

जिस कोने में खड़ी हूँ मैं .....
यहाँ से तुम
कुछ थके से हो
यहाँ देखो एक बारी
आओ सर में बादाम-तेल दाब दूँ गरम
झुके से नैना तुम्हारे
मेरी आँखों का सहारा पा लें
छू लूँ तुम्हारे अधरों को
ह्रदय तुम्हारा सागर बहा लें
तुम्हारे हाथ ,खोज रहें हैं मेरी मुस्कान की लाठी
हाथों में हाथ लिए
फिर साथ चलें चलो
जिस कोने में खड़ी हूँ मै ........
तुम अँधेरा काट रहे हो
मेरी दीप्त पुतलियाँ अब भी हैं यहीं
गीलें सूरज को रेत पर
फिर से सेंकें चलो
पास बहते सागर से
अंजुली भर लहरें लेकर
तुम्हारी गर्म पलकों पर सेंकूँ
गले में ठंडे पानी सा
अपने स्पर्श से तरावट ला दूँ
जिस कोने में खड़ी हूँ मैं .............
हमारे बीच का फासला बहुत दूर नहीं
हाथ बढ़ा कर छू सकते हो तुम
मेरी हँसी को
अब भी
सदा की तरह
छुपा लूँगी तुम्हे
तुम्हे याद है न वादा मेरा ?

Thursday, December 18, 2008

गीत को तुम्हारे...........


गीत को तुम्हारे
तरसता है जी .....
तुम्हारे उन नैनों के लिए
जिन में बैठी हंसती मै लजीली
उस लम्हे की डाली को
झुकाता रहता है जी ....
जो तुम्हारे स्पर्श से पुलके
उस कौमुदी के बिखरे कणों को
बिनता रहता है जी ......
बस पुराना जो ख्वाब लौटा
सिर्फ़ तुम्हारे लिए
रोता रहता है जी..........

Saturday, December 13, 2008

उस पल की परीक्षा


उस पल की परीक्षा
न हार न जीत जिसमें
उस आस का अनुभव
न मिलन न बिछोह जन्में
बस रुका हुआ धुआं
बसे रहे श्वासों में
हर छाया की छाई
पुती हो हाथों में
अन्दर का शोर
न बाँध पाए सीने में
क्या बह निकली धारा
रिसते मन के घावों से
या टीस चुभी है
आजीवन मरण की
जो है वो निरर्थक बना
जो नहीं......उसी का भोग बदा
हे विधाता...........