जिस कोने में खड़ी हूँ मैं .....यहाँ से तुम
कुछ थके से हो
यहाँ देखो एक बारी
आओ सर में बादाम-तेल दाब दूँ गरम
झुके से नैना तुम्हारे
मेरी आँखों का सहारा पा लें
छू लूँ तुम्हारे अधरों को
ह्रदय तुम्हारा सागर बहा लें
तुम्हारे हाथ ,खोज रहें हैं मेरी मुस्कान की लाठी
हाथों में हाथ लिए
फिर साथ चलें चलो
जिस कोने में खड़ी हूँ मै ........
तुम अँधेरा काट रहे हो
मेरी दीप्त पुतलियाँ अब भी हैं यहीं
गीलें सूरज को रेत पर
फिर से सेंकें चलो
पास बहते सागर से
अंजुली भर लहरें लेकर
तुम्हारी गर्म पलकों पर सेंकूँ
गले में ठंडे पानी सा
अपने स्पर्श से तरावट ला दूँ
जिस कोने में खड़ी हूँ मैं .............
हमारे बीच का फासला बहुत दूर नहीं
हाथ बढ़ा कर छू सकते हो तुम
मेरी हँसी को
अब भी
सदा की तरह
छुपा लूँगी तुम्हे
तुम्हे याद है न वादा मेरा ?




