Tuesday, December 30, 2008

जिस कोने में खड़ी हूँ मैं ........

जिस कोने में खड़ी हूँ मैं .....
यहाँ से तुम
कुछ थके से हो
यहाँ देखो एक बारी
आओ सर में बादाम-तेल दाब दूँ गरम
झुके से नैना तुम्हारे
मेरी आँखों का सहारा पा लें
छू लूँ तुम्हारे अधरों को
ह्रदय तुम्हारा सागर बहा लें
तुम्हारे हाथ ,खोज रहें हैं मेरी मुस्कान की लाठी
हाथों में हाथ लिए
फिर साथ चलें चलो
जिस कोने में खड़ी हूँ मै ........
तुम अँधेरा काट रहे हो
मेरी दीप्त पुतलियाँ अब भी हैं यहीं
गीलें सूरज को रेत पर
फिर से सेंकें चलो
पास बहते सागर से
अंजुली भर लहरें लेकर
तुम्हारी गर्म पलकों पर सेंकूँ
गले में ठंडे पानी सा
अपने स्पर्श से तरावट ला दूँ
जिस कोने में खड़ी हूँ मैं .............
हमारे बीच का फासला बहुत दूर नहीं
हाथ बढ़ा कर छू सकते हो तुम
मेरी हँसी को
अब भी
सदा की तरह
छुपा लूँगी तुम्हे
तुम्हे याद है न वादा मेरा ?

28 comments:

makrand said...

poem and painting both are sensetive to explore the heart
great work

मीत said...

fir se bahut sunder likha hai guru swati...
aapke shbdon mein bahe chala jata hoon ---meet

नीरज गोस्वामी said...

अद्भुत स्वाति जी...अद्भुत रचना है ये आप की...आप दिल की गहराईयों से लिखती हैं...वाह....
नीरज

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा एवं भावपूर्ण...वाह!!!!!!!

सुनील मंथन शर्मा said...

उससे किया अपना वादा मुझे भी याद है, पर निभा ही नहीं पा रहा हूँ.
बहुत अच्छी कविता.

विनय said...

नववर्ष की हार्दिक मंगलकामनाएँ!

मोहन वशिष्‍ठ said...

बहुत सुंदर लिखा है आपने लिखते रहो

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं सहित

shelley said...

achchi kavita hai visheshkar antim pairagraph.

mehek said...

bahut sundar

महेंद्र मिश्रा said...

बहुत बढ़िया पोस्ट पढ़कर अच्छी लगी. धन्यवाद. नववर्ष की ढेरो शुभकामनाये और बधाइयाँ स्वीकार करे . आपके परिवार में सुख सम्रद्धि आये और आपका जीवन वैभवपूर्ण रहे . मंगल्कामानाओ के साथ .
महेंद्र मिश्रा,जबलपुर.

ANIL KANT said...

ati uttam sweta ji

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

नव -वर्ष मँगलमय हो
कविता, चित्र और रँगीन Fonts
सभी से सज रहा है
आज का पन्ना स्वाति जी -
स स्नेह,
- लावण्या

गौतम राजरिशी said...

क्या बात है...डूबती-उतराती सी ये रचना
मेरी दीप्त पुतलियाँ अब भी हैं यहीं
गीलें सूरज को रेत पर
फिर से सेंकें चलो

सुंदर

dr. ashok priyaranjan said...

बहुत अच्छा िलखा है आपने । नए साल में यह सफर और तेज होगा, एेसी उम्मीद है ।

नए साल का हर पल लेकर आए नई खुशियां । आंखों में बसे सारे सपने पूरे हों । सूरज की िकरणों की तरह फैले आपकी यश कीितॆ । नए साल की हािदॆक शुभकामनाएंें-

http://www.ashokvichar.blogspot.com

Dev said...

नववर्ष की ढेरो शुभकामनाये और बधाइयाँ स्वीकार करे . आपके परिवार में सुख सम्रद्धि आये और आपका जीवन वैभवपूर्ण रहे . मंगल कामनाओ के साथ .धन्यवाद.

Beji said...

Swati,

jab bhi padhti hun tumhe....ruk kar ek baar tumhe yaad jaroor karti hun....phir koshish karti hun girte utarte bhavon ko tumhaare maasoom vyaktitva me fit karun....

Happy new year!

अनुपम अग्रवाल said...

भावनाओं के सुमधुर प्रस्तुतिकरण के लिए आपको बधाई

तरूश्री शर्मा said...

बढ़िया कविता है स्वाति। खासकर ये पंक्तियां दिल को छू गईं -
तुम अंधेरा काट रहे हो,
मेरी दीप्त पुतलियां अब भी हैं यहीं।
बहुत बढ़िया लगता है लोट लोटकर आना पड़ेगा आपके ब्लॉग पर।

BrijmohanShrivastava said...

मार्मिक रचना

abhivyakti said...

bhawnaon ka snehil sansparh hai aapki kavita.
naye varsh ki hardik shubhkamna -jaya

डॉ .अनुराग said...

aisa laga jaise kisi geet ko sun raha hun.ya kisi aise insaan ki aavaj ko jo apne saathi se behad lagav rakhta hai.nischal aor pavitr bhavna.....
naye varsh ki shubhkamaye.

योगेन्द्र मौदगिल said...

Wah.......

अभिषेक ओझा said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति...
नववर्ष की शुभकामनायें !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

उस कोने से मन की बात बहुत अच्छी तरह कही जाती है!

नव-वर्ष की शुभकामनाएं!

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) said...

हम्म्म्म्म्म्म्म्म्म तो आप यहाँ हायकू कहती रहीं और हमें पता भी ना चला...........तो भाई हम कहे के भूतनाथ....??...............और ये क्या लिख दिया आपने...
हमारे बीच का फासला बहुत दूर नहीं
हाथ बढ़ा कर छू सकते हो तुम
मेरी हँसी को
अब भी
सदा की तरह
छुपा लूँगी तुम्हे
तुम्हे याद है न वादा मेरा ?.............ऐसा लगा कि ये समूची पंक्तियाँ आप बैठकर हमें जैसे हमारे लिए ही सूना रहे हो....!!पढ़ते हुए........ओ सॉरी आपसे सुनते हुए हम एकदम से तरंगित हो रहे.....!!ये ही इस कविता की सफलता...........ग्राहकता है.....जिसने मेरी तरह ना जाने कितने ही पाठकों को बांधा होगा.....!!

शिवराज गूजर. said...

bahut hi badiya. man ko chhho lene wali rachana. aapki kalam ki gati pathak ko apane saath is tarah chalane par majboor kar deti hai ki wo bus rachana main hi khokar rah jata hai. padane ke bahut der baad tak bhi uske dimag main uthal-puthal chalti rahti hai. badhai.

Srijan said...

कहाँ से इतने मर्मस्पर्शी शब्दों के खजाने को ढूँढ निकाला है! उसमन को टटोलने का मनकरता है.
मन की किस तलहटी मे इतने शब्दों के मोतीछुपे हैं. आपका रचनात्मकहृदय उतना ही सुंदर है जितना की आप. बहुत खूब!! क़लम चलाते रहो. स्वाती की बूँद की तरह पाठक आपके की रचनात्मक-वृष्टि के लिए आकुल रहेगा. शुभकामनाएँ!!

Srijan said...

कहाँ से इतने मर्मस्पर्शी शब्दों के खजाने को ढूँढ निकाला है! उस मन को टटोलने का मनकरता है.
मन की किस तलहटी मे इतने सुंदरशब्दों के मोतीछुपे हैं. आपका रचनात्मकहृदय उतना ही सुंदर है जितना की आप. बहुत खूब. क़लम चलाते रहो. स्वाती की बूँद की तरह पाठक आपके की रचनात्मकवृष्टि के लिए आकुल रहेगा. शुभकामनाएँ!!