Saturday, December 13, 2008

उस पल की परीक्षा


उस पल की परीक्षा
न हार न जीत जिसमें
उस आस का अनुभव
न मिलन न बिछोह जन्में
बस रुका हुआ धुआं
बसे रहे श्वासों में
हर छाया की छाई
पुती हो हाथों में
अन्दर का शोर
न बाँध पाए सीने में
क्या बह निकली धारा
रिसते मन के घावों से
या टीस चुभी है
आजीवन मरण की
जो है वो निरर्थक बना
जो नहीं......उसी का भोग बदा
हे विधाता...........

10 comments:

dr. ashok priyaranjan said...

स्वाित जी,
बहुत अच्छी रचना है । जीवन की अनुभूितयों और यथाथॆ को सुंदरता से शबद्बद्ध िकया है ।

नीरज गोस्वामी said...

क्या बात है स्वाति जी....बहुत विलक्षण रचना....वाह.
नीरज

अभिषेक ओझा said...

बहुत खूब !

अक्षय-मन said...

कमाल की सोच है ....
बहुत ही गहेरा लिखा दिया आपने....अबकी बार....

अक्षय-मन

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...

गहरी अभिव्यक्ति . बढ़िया रचना. धन्यवाद. स्वाति जी.

mehek said...

bahut khub

मीत said...

जब भी आपके शब्द पढता हूँ, इनमें खो सा जाता हूँ...
बहुत सुंदर...
---मीत

डॉ .अनुराग said...

चित्र इतना खूबसूरत है की एक तक देखता रहा ....आपसे उधार मांगने का मन है...कविता तो खैर अभिव्यक्ति कर ही रही है.....

क्षितीश said...

अच्छी रचना...!!! एक दुखी आत्मा का एकालाप और एक विरही का प्रलाप-सा कुछ पूरी कविता में प्रतिबिंबित हो रही है...!!!!

Rohit Tripathi said...

bahut sundar swati ji..

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