
उस पल की परीक्षा
न हार न जीत जिसमें
उस आस का अनुभव
न मिलन न बिछोह जन्में
बस रुका हुआ धुआं
बसे रहे श्वासों में
हर छाया की छाई
पुती हो हाथों में
अन्दर का शोर
न बाँध पाए सीने में
क्या बह निकली धारा
रिसते मन के घावों से
या टीस चुभी है
आजीवन मरण की
जो है वो निरर्थक बना
जो नहीं......उसी का भोग बदा
हे विधाता...........



10 comments:
स्वाित जी,
बहुत अच्छी रचना है । जीवन की अनुभूितयों और यथाथॆ को सुंदरता से शबद्बद्ध िकया है ।
क्या बात है स्वाति जी....बहुत विलक्षण रचना....वाह.
नीरज
बहुत खूब !
कमाल की सोच है ....
बहुत ही गहेरा लिखा दिया आपने....अबकी बार....
अक्षय-मन
गहरी अभिव्यक्ति . बढ़िया रचना. धन्यवाद. स्वाति जी.
bahut khub
जब भी आपके शब्द पढता हूँ, इनमें खो सा जाता हूँ...
बहुत सुंदर...
---मीत
चित्र इतना खूबसूरत है की एक तक देखता रहा ....आपसे उधार मांगने का मन है...कविता तो खैर अभिव्यक्ति कर ही रही है.....
अच्छी रचना...!!! एक दुखी आत्मा का एकालाप और एक विरही का प्रलाप-सा कुछ पूरी कविता में प्रतिबिंबित हो रही है...!!!!
bahut sundar swati ji..
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