Tuesday, December 18, 2007

गौरी ग्रसन

क्या शक्ति क्या नारी-मन,
कर में पहन कंचन-कंगन,
है साध रही हर संचित स्वप्न

हर दमन से उत्पन्न उप-रत्न
क्या नहीं सजा नारी कंठमाल?

मणि बना शॊषण का काल ?
क्या नहीं हुई नियति से हार ?
प्रारब्ध बना मुखौटा हर बार
हर मनीषी का मृदु मधुदान,
बिका हाट ,प्रमदा का मान

पाथर हुआ हर पॊर हर पाथ
शुष्क हुआ हर आद्रित साथ
हर संघर्ष सिर्फ नारी की पारी

हर बार बनी श्रृंगारिक सहचारी
न हुआ अंत ,हाला का हाय!
प्रारबध बना कटु पर्याय

जो तुम आ जाते एक बार


जॊ तुम आ जाते एक बार

हॊ जाती मैं

रजनीगँधा-रंजित

पलित-पंखुड़ियॊं कॊ

पुष्प देते वार

रत्नॊं सा दमकता

मेरा राग

महक उठती फिर से मालती

परिमल हॊता साकार

जॊ तुम आ जाते एक बार

सुन निर्मोही


अबोध- प्रेम का अभिनव क्षण
की चिर प्रतीक्षा प्रत्यहम
सुनो

आ जाओ बस एक बार
कर दो मुक्त ,विपुल विषाद

तटिनी तीरे स्फुटित सुमन
कर हारे हैं सभी जतन
सुनो
तुम मनाओ बस एक बार
तो जी जाऊँ निज स्व- आधार

उन नैनों का वो आह्लाद
वो मृदु तरल तारक संवाद
सुनो
तुम छू जाओ बस एक बार
प्रीत दे मेरा पंथ पखार

ललक न समझी मैं लगन की
पांति-पल्लवित पराग पुष्प की
सुनो
तुम लुटा जाओ बस एक बार
निज ललित सुर्ख सकल लगाव